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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

अजब तरह का है मौसम कि ख़ाक उड़ती है
वो दिन भी थे कि खिले थे गुलाब आँखों में

इफ़्तिख़ार आरिफ़




अजीब ही था मिरे दौर-ए-गुमरही का रफ़ीक़
बिछड़ गया तो कभी लौट कर नहीं आया

इफ़्तिख़ार आरिफ़




अज़ाब ये भी किसी और पर नहीं आया
कि एक उम्र चले और घर नहीं आया

इफ़्तिख़ार आरिफ़




अज़ाब-ए-वहशत-ए-जाँ का सिला न माँगे कोई
नए सफ़र के लिए रास्ता न माँगे कोई

इफ़्तिख़ार आरिफ़




बहुत मुश्किल ज़मानों में भी हम अहल-ए-मोहब्बत
वफ़ा पर इश्क़ की बुनियाद रखना चाहते हैं

इफ़्तिख़ार आरिफ़




बस एक ख़्वाब की सूरत कहीं है घर मेरा
मकाँ के होते हुए ला-मकाँ के होते हुए

इफ़्तिख़ार आरिफ़




बेटियाँ बाप की आँखों में छुपे ख़्वाब को पहचानती हैं
और कोई दूसरा इस ख़्वाब को पढ़ ले तो बुरा मानती हैं

इफ़्तिख़ार आरिफ़