बुलंद हाथों में ज़ंजीर डाल देते हैं
अजीब रस्म चली है दुआ न माँगे कोई
इफ़्तिख़ार आरिफ़
दर-ओ-दीवार इतने अजनबी क्यूँ लग रहे हैं
ख़ुद अपने घर में आख़िर इतना डर क्यूँ लग रहा है
इफ़्तिख़ार आरिफ़
दयार-ए-नूर में तीरा-शबों का साथी हो
कोई तो हो जो मिरी वहशतों का साथी हो
इफ़्तिख़ार आरिफ़
दिल कभी ख़्वाब के पीछे कभी दुनिया की तरफ़
एक ने अज्र दिया एक ने उजरत नहीं दी
इफ़्तिख़ार आरिफ़
दिल के मा'बूद जबीनों के ख़ुदाई से अलग
ऐसे आलम में इबादत नहीं होगी हम से
इफ़्तिख़ार आरिफ़
दिल पागल है रोज़ नई नादानी करता है
आग में आग मिलाता है फिर पानी करता है
इफ़्तिख़ार आरिफ़
दिल उन के साथ मगर तेग़ और शख़्स के साथ
ये सिलसिला भी कुछ अहल-ए-रिया का लगता है
इफ़्तिख़ार आरिफ़

