वो मुझ को भूल चुका अब यक़ीन है वर्ना
वफ़ा नहीं तो जफ़ाओं का सिलसिला रखता
इफ़्फ़त ज़र्रीं
ज़ेहन ओ दिल के फ़ासले थे हम जिन्हें सहते रहे
एक ही घर में बहुत से अजनबी रहते रहे
इफ़्फ़त ज़र्रीं
अजब तनाव है माहौल में कहें किस से
कहीं पे आज कोई हादसा हुआ तो नहीं
इफ़्तिख़ार आज़मी
हुस्न यूँ इश्क़ से नाराज़ है अब
फूल ख़ुश्बू से ख़फ़ा हो जैसे
इफ़्तिख़ार आज़मी
कितना सुनसान है रस्ता दिल का
क़ाफ़िला कोई लुटा हो जैसे
इफ़्तिख़ार आज़मी
शोर-ए-दरिया-ए-वफ़ा इशरत-ए-साहिल के क़रीब
रुक गए अपने क़दम आए जो मंज़िल के क़रीब
इफ़्तिख़ार आज़मी
अब भी तौहीन-ए-इताअत नहीं होगी हम से
दिल नहीं होगा तो बैअत नहीं होगी हम से
इफ़्तिख़ार आरिफ़

