घर की वहशत से लरज़ता हूँ मगर जाने क्यूँ
शाम होती है तो घर जाने को जी चाहता है
इफ़्तिख़ार आरिफ़
घर से निकले हुए बेटों का मुक़द्दर मालूम
माँ के क़दमों में भी जन्नत नहीं मिलने वाली
इफ़्तिख़ार आरिफ़
हामी भी न थे मुंकिर-ए-'ग़ालिब' भी नहीं थे
हम अहल-ए-तज़बज़ुब किसी जानिब भी नहीं थे
इफ़्तिख़ार आरिफ़
हम अपने रफ़्तगाँ को याद रखना चाहते हैं
दिलों को दर्द से आबाद रखना चाहते हैं
इफ़्तिख़ार आरिफ़
हम भी इक शाम बहुत उलझे हुए थे ख़ुद में
एक शाम उस को भी हालात ने मोहलत नहीं दी
इफ़्तिख़ार आरिफ़
हमें भी आफ़ियत-ए-जाँ का है ख़याल बहुत
हमें भी हल्क़ा-ए-ना-मोतबर में रक्खा जाए
इफ़्तिख़ार आरिफ़
हमें तो अपने समुंदर की रेत काफ़ी है
तू अपने चश्मा-ए-बे-फ़ैज़ को सँभाल के रख
इफ़्तिख़ार आरिफ़

