कौन समझे हम पे क्या गुज़री है 'नक़्श'
दिल लरज़ उठता है ज़िक्र-ए-शाम से
महेश चंद्र नक़्श
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ख़ुद-शनासी थी जुस्तुजू तेरी
तुझ को ढूँडा तो आप को पाया
महेश चंद्र नक़्श
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किस तरह करें तुझ से गिला तेरे सितम का
मदहोश इशारों ने भी दिल तोड़ दिया है
महेश चंद्र नक़्श
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मेरी ख़ामोशियों के आलम में
गूँज उठती है आप की आवाज़
महेश चंद्र नक़्श
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मिरी नाकामियों पर हँसने वाले
तिरे पहलू में शायद दिल नहीं है
महेश चंद्र नक़्श
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मोहब्बत का उन को यक़ीं आ चला है
हक़ीक़त बने जा रहे हैं फ़साने
महेश चंद्र नक़्श
फिर किसी की बज़्म का आया ख़याल
फिर धुआँ उट्ठा दिल-ए-नाकाम से
महेश चंद्र नक़्श
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