तुझे रौशनी से जुदा करूँ किसी शाम मैं
तुझे इतनी ताब में देखना नहीं हो रहा
महेंद्र कुमार सानी
उसे मैं दूर ही से देखता रहा 'सानी'
जो आज पानी में उतरा हूँ तो खुला दरिया
महेंद्र कुमार सानी
यक़ीनन सोचता होगा वो मुझ को
उसे मैं ने अभी सोचा नहीं है
महेंद्र कुमार सानी
आपसी रिश्तों की ख़ुशबू को कोई नाम न दो
इस तक़द्दुस को न काग़ज़ पर उतारा जाए
महेंद्र प्रताप चाँद
मात-पिता को दे बन-वास
ख़ुद को आज्ञाकारी लिख
महेंद्र प्रताप चाँद
पराए दर्द में होता नहीं शरीक कोई
ग़मों के बोझ को ख़ुद आप ढोना पड़ता है
महेंद्र प्रताप चाँद
उसी ने आग लगाई है सारी बस्ती में
वही ये पूछ रहा है कि माजरा क्या है
महेंद्र प्रताप चाँद

