अब उसे अपनी शबाहत भी गुज़रती है गिराँ
घर के अंदर कोई शीशा नहीं रहने देता
महफूजुर्रहमान आदिल
बात तो जब है फ़स्ल-ए-जुनूँ में दीवाने तो दीवाने
अहल-ए-ख़िरद भी रक़्स करें ज़ंजीरों की झंकारों पर
महफूजुर्रहमान आदिल
बे-लिबासी मिरी तौक़ीर का बाइ'स ठहरी
बोल-बाला है बहुत शहर में उर्यानी का
महफूजुर्रहमान आदिल
भूली-बिसरी दास्ताँ मुझ को न समझो
मैं नई पहचान का इक वास्ता हूँ
महफूजुर्रहमान आदिल
देख लेना एक दिन बे-रोज़-गारी का अज़ाब
छीन कर चेहरों की सारी दिलकशी ले जाएगा
महफूजुर्रहमान आदिल
एक दिन वो ज़र्रों को आफ़्ताब कर लेंगे
धूप के जो ख़्वाहाँ हैं रात के अँधेरे में
महफूजुर्रहमान आदिल
हमेशा धूप की चादर पे तकिया कौन करता है
खुली छत है तो फिर बरसात का भी सामना होगा
महफूजुर्रहमान आदिल

