शाइरी में अन्फ़ुस-ओ-आफ़ाक़ मुबहम हैं अभी
इस्तिआरा ही हक़ीक़त में ख़ुदा सा ख़्वाब है
काविश बद्री
सुख की ज़मीं बसीत नहीं है तो क्या हुआ
दुख तो मिरा विशाल है आकाश की तरह
काविश बद्री
मैं तीरगी को अमानत तिरी समझता हूँ
तू रौशनी है तो कोई किरन उतार मुझे
काविश बट
बदल लिया है ज़रा ख़्वाब के इलाक़े को
मकाँ को छोड़ के अब ला-मकाँ में रहता हूँ
ख़ावर एजाज़
हाथ लगाते ही मिट्टी का ढेर हुए
कैसे कैसे रंग भरे थे ख़्वाबों में
ख़ावर एजाज़
इक अर्से बाद हुई खुल के गुफ़्तुगू उस से
इक अर्से बाद वो काँटा चुभा हुआ निकला
ख़ावर एजाज़
जहाँ तुम हो वहाँ से दूर पड़ती है ज़मीं मेरी
जहाँ मैं हूँ वहाँ से आसमाँ नज़दीक पड़ता है
ख़ावर एजाज़

