तुझे कुछ उस की ख़बर भी है भूलने वाले
किसी को याद तेरी बार बार आई है
कौसर नियाज़ी
उस ने इख़्लास के मारे हुए दीवाने को
एक आवारा ओ बदनाम सा शायर जाना
कौसर नियाज़ी
वो मिल न सके याद तो है उन की सलामत
इस याद से भी हम ने बहुत काम लिया है
कौसर नियाज़ी
ये दर्द कि है तेरी मोहब्बत की अमानत
मर जाएँगे इस दर्द का दरमाँ न करेंगे
कौसर नियाज़ी
ज़रूर तेरी गली से गुज़र हुआ होगा
कि आज बाद-ए-सबा बे-क़रार आई है
कौसर नियाज़ी
हमें जो फ़िक्र की दावत न दे सके 'कौसर'
वो शेर शेर तो है रूह-ए-शाएरी तो नहीं
कौसर सीवानी
हरीफ़ों की तरफ़-दारी से अपना-पन का दम टूटा
बढ़ी कुछ और जब दूरी तो क़ुर्बत का भरम टूटा
कौसर सीवानी

