मिरे और उस के बीच इक धुँद सी मौजूद रहती है
ये दुनिया आ रही है मेरे उस के दरमियाँ शायद
ख़ावर एजाज़
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मिरे सेहन पर खुला आसमान रहे कि मैं
उसे धूप छाँव में बाँटना नहीं चाहता
ख़ावर एजाज़
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मुझे इस ख़्वाब ने इक अर्से तक बे-ताब रक्खा है
इक ऊँची छत है और छत पर कोई महताब रक्खा है
ख़ावर एजाज़
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सुना रही है जिसे जोड़ जोड़ कर दुनिया
तमाम टुकड़े हैं वो मेरी दास्तान के ही
ख़ावर एजाज़
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उफ़ुक़ पर डूबने वाला सितारा
कई इम्कान रौशन कर गया है
ख़ावर एजाज़
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ये दिल हद से गुज़रना चाहता था
मगर मजबूर हो कर रह गया है
ख़ावर एजाज़
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ये दिल ये शहर-ए-वफ़ा कब उसे पसंद आया
वो बे-क़रार था उस को यहाँ से जाना था
ख़ावर एजाज़
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