ज़वाल-ए-अहद तो शायद मुझे न पहचाने
मैं इक हवाला हूँ और कर्बला से आया हूँ
ख़ावर एजाज़
अपने सहरा से बंधे प्यास के मारे हुए हम
मुंतज़िर हैं कि इधर कोई कुआँ आ निकले
ख़ावर जीलानी
बनने वाली बात वही होती है वो जो
बनते बनते यकसर बनती रह जाती है
ख़ावर जीलानी
दिलों की शीशागरी कार-गह-ए-हस्ती में
हुनर के ज़ेर ओ ज़बर से भी टूट सकती थी
ख़ावर जीलानी
इक चिंगारी आग लगा जाती है बन में और कभी
एक किरन से ज़ुल्मत को छट जाना पड़ता है
ख़ावर जीलानी
जीना तो अलग बात है मरना भी यहाँ पर
हर शख़्स की अपनी ही ज़रूरत के लिए है
ख़ावर जीलानी
नहीं है कोई भी हतमी यहाँ हद-ए-मालूम
हर एक इंतिहा इक और इंतिहा तक है
ख़ावर जीलानी

