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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

संकट के दिन थे तो साए भी मुझ से कतराते थे
सुख के दिन आए तो देखो दुनिया मेरे साथ हुई

इमाम अाज़म




तेरी ख़ुशबू से मोअत्तर है ज़माना सारा
कैसे मुमकिन है वो ख़ुशबू भी गुलाबों में मिले

इमाम अाज़म




उन के रुख़्सत का वो लम्हा मुझे यूँ लगता है
वक़्त नाराज़ हुआ दिन भी ढला हो जैसे

इमाम अाज़म




आती जाती है जा-ब-जा बदली
साक़िया जल्द आ हवा बदली

इमाम बख़्श नासिख़




ऐ अजल एक दिन आख़िर तुझे आना है वले
आज आती शब-ए-फ़ुर्क़त में तो एहसाँ होता

इमाम बख़्श नासिख़




ऐन दानाई है 'नासिख़' इश्क़ में दीवानगी
आप सौदाई हैं जो कहते हैं सौदाई मुझे

इमाम बख़्श नासिख़




दरिया-ए-हुस्न और भी दो हाथ बढ़ गया
अंगड़ाई उस ने नश्शे में ली जब उठा के हाथ

इमाम बख़्श नासिख़