देख कर तुझ को क़दम उठ नहीं सकता अपना
बन गए सूरत-ए-दीवार तिरे कूचे में
इमाम बख़्श नासिख़
फ़ुर्क़त क़ुबूल रश्क के सदमे नहीं क़ुबूल
क्या आएँ हम रक़ीब तेरी अंजुमन में है
इमाम बख़्श नासिख़
फ़ुर्क़त-ए-यार में इंसान हूँ मैं या कि सहाब
हर बरस आ के रुला जाती है बरसात मुझे
इमाम बख़्श नासिख़
गया वो छोड़ कर रस्ते में मुझ को
अब उस का नक़्श-ए-पा है और मैं हूँ
इमाम बख़्श नासिख़
गो तू मिलता नहीं पर दिल के तक़ाज़े से हम
रोज़ हो आते हैं सौ बार तिरे कूचे में
इमाम बख़्श नासिख़
हम मय-कशों को डर नहीं मरने का मोहतसिब
फ़िरदौस में भी सुनते हैं नहर-ए-शराब है
इमाम बख़्श नासिख़
हम ज़ईफ़ों को कहाँ आमद ओ शुद की ताक़त
आँख की बंद हुआ कूचा-ए-जानाँ पैदा
इमाम बख़्श नासिख़

