किस क़दर गुनाहों के मुर्तकिब हुए हैं हम
जो सुकून लुटता है बार बार इस घर का
इकराम मुजीब
पहले दरवाज़े पे दस्तक दे लूँ
फिर ये दीवार गिरा भी दूँगा
इकराम तबस्सुम
आज की शाम गुज़ारेंगे हम छतरी में
बारिश होगी ख़बरें सुन कर आया हूँ
इलियास बाबर आवान
इस उलझन को सुलझाने की कौन सी है तदबीर लिखो
इश्क़ अगर है जुर्म तो मुजरिम राँझा है या हीर लिखो
इलियास इश्क़ी
कोई क़र्या कोई दयार हो कहीं हम अकेले नहीं रहे
तिरी जुस्तुजू में जहाँ गए वहीं साथ दर-बदरी रही
इलियास इश्क़ी
वही आग अपना नसीब थी कि तमाम उम्र जला किए
जो लगाई थी कभी इश्क़ ने वही आग दिल में भरी रही
इलियास इश्क़ी
वक़्त आया तो ख़ून से अपने दाग़-ए-नदामत धो लेंगे
साया-ए-ज़ुल्फ़ में जागने वाले साया-ए-दार में सो लेंगे
इलियास इश्क़ी

