हिर-फिर के दाएरे ही में रखता हूँ मैं क़दम
आई कहाँ से गर्दिश-ए-पर्कार पाँव में
इमाम बख़्श नासिख़
हो गए दफ़्न हज़ारों ही गुल-अंदाज़ इस में
इस लिए ख़ाक से होते हैं गुलिस्ताँ पैदा
इमाम बख़्श नासिख़
हो गया ज़र्द पड़ी जिस पे हसीनों की नज़र
ये अजब गुल हैं कि तासीर-ए-ख़िज़ाँ रखते हैं
इमाम बख़्श नासिख़
जिस क़दर हम से तुम हुए नज़दीक
उस क़दर दूर कर दिया हम को
इमाम बख़्श नासिख़
जिस्म ऐसा घुल गया है मुझ मरीज़-ए-इश्क़ का
देख कर कहते हैं सब तावीज़ है बाज़ू नहीं
इमाम बख़्श नासिख़
जुस्तुजू करनी हर इक अम्र में नादानी है
जो कि पेशानी पे लिक्खी है वो पेश आनी है
इमाम बख़्श नासिख़
काम औरों के जारी रहें नाकाम रहें हम
अब आप की सरकार में क्या काम हमारा
इमाम बख़्श नासिख़

