ख़िरद को ख़ाना-ए-दिल का निगह-बाँ कर दिया हम ने
ये घर आबाद होता इस को वीराँ कर दिया हम ने
इज्तिबा रिज़वी
मिरे साज़-ए-नफ़स की ख़ामुशी पर रूह कहती है
न आई मुझ को नींद और सो गया अफ़्साना-ख़्वाँ मेरा
इज्तिबा रिज़वी
ज़बाँ से दिल का फ़साना अदा किया न गया
ये तर्जुमाँ तो बनी थी मगर बना न गया
इज्तिबा रिज़वी
एक दर्द की लज़्ज़त बरक़रार रखने को
कुछ लतीफ़ जज़्बों की ख़ूँ से आबयारी की
इकराम मुजीब
हिज्र की मसाफ़त में साथ तू रहा हर दम
दूर हो गए तुझ से जब तिरे क़रीं पहुँचे
इकराम मुजीब
इस हसीन मंज़र से दुख कई उभरने हैं
धूप जब उतरनी है बर्फ़ के मकानों पर
इकराम मुजीब
कम ज़रा न होने दी एक लफ़्ज़ की हुरमत
एक अहद की सारी उम्र पासदारी की
इकराम मुजीब

