करे जो हर क़दम पर एक नाला
ज़माने में दिरा है और मैं हूँ
इमाम बख़्श नासिख़
करती है मुझे क़त्ल मिरे यार की तलवार
तलवार की तलवार है रफ़्तार की रफ़्तार
इमाम बख़्श नासिख़
किस तरह छोड़ूँ यकायक तेरी ज़ुल्फ़ों का ख़याल
एक मुद्दत के ये काले नाग हैं पाले हुए
इमाम बख़्श नासिख़
क्या रोज़-ए-बद में साथ रहे कोई हम-नशीं
पत्ते भी भागते हैं ख़िज़ाँ में शजर से दूर
इमाम बख़्श नासिख़
लेते लेते करवटें तुझ बिन जो घबराता हूँ मैं
नाम ले ले कर तिरा रातों को चिल्लाता हूँ मैं
इमाम बख़्श नासिख़
माशूक़ों से उम्मीद-ए-वफ़ा रखते हो 'नासिख़'
नादाँ कोई दुनिया में नहीं तुम से ज़ियादा
इमाम बख़्श नासिख़
मुँह आप को दिखा नहीं सकता है शर्म से
इस वास्ते है पीठ इधर आफ़्ताब की
इमाम बख़्श नासिख़

