तुम ने रस्मन मुझे सलाम किया
लोग क्या क्या गुमान कर बैठे
इफ़्तिख़ार राग़िब
वो कहते हैं कि 'राग़िब' तुम नहीं रखते ख़याल अपना
मैं कहता हूँ कि हर दम फ़िक्र दामन-गीर किस की है
इफ़्तिख़ार राग़िब
ये वस्ल की रुत है कि जुदाई का है मौसम
ये गुलशन-ए-दिल है कि बयाबान कहीं का
इफ़्तिख़ार राग़िब
हिजरत की घड़ी हम ने तिरे ख़त के अलावा
बोसीदा किताबों को भी सामान में रक्खा
इफ्तिखार शफ़ी
था कोई वहाँ जो है यहाँ भी है वहाँ भी
जो हूँ मैं यहाँ हूँ मैं वहाँ कोई नहीं था
इफ्तिखार शफ़ी
अफ़्सुर्दगी भी हुस्न है ताबिंदगी भी हुस्न
हम को ख़िज़ाँ ने तुम को सँवारा बहार ने
इज्तिबा रिज़वी
चुराने को चुरा लाया मैं जल्वे रू-ए-रौशन से
मगर अब बिजलियाँ लिपटी हुई हैं दिल के दामन से
इज्तिबा रिज़वी

