इस क़दर बढ़ने लगे हैं घर से घर के फ़ासले
दोस्तों से शाम के पैदल सफ़र छीने गए
इफ़्तिख़ार क़ैसर
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मिरे चेहरे को चेहरा कब इनायत कर रहे हो
तुम्हें मेरे सिवा चेहरा तुम्हारा कौन देगा
इफ़्तिख़ार क़ैसर
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सारे दरिया फूट पड़ेंगे इक दूजे के बीच
इक दिन आ कर मिल जाएगी तेरी मेरी प्यास
इफ़्तिख़ार क़ैसर
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बे-सबब 'राग़िब' तड़प उठता है दिल
दिल को समझाना पड़ेगा ठीक से
इफ़्तिख़ार राग़िब
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चंद यादें हैं चंद सपने हैं
अपने हिस्से में और क्या है जी
इफ़्तिख़ार राग़िब
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दिल में कुछ भी तो न रह जाएगा
जब तिरी चाह निकल जाएगी
इफ़्तिख़ार राग़िब
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दिन में आने लगे हैं ख़्वाब मुझे
उस ने भेजा है इक गुलाब मुझे
इफ़्तिख़ार राग़िब
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