क्या बताऊँ कि कितनी शिद्दत से
तुम से मिलने को चाहता है जी
इफ़्तिख़ार राग़िब
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ले जाए जहाँ चाहे हवा हम को उड़ा कर
टूटे हुए पत्तों की हिकायत ही अलग है
इफ़्तिख़ार राग़िब
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पढ़ता रहता हूँ आप का चेहरा
अच्छी लगती है ये किताब मुझे
इफ़्तिख़ार राग़िब
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राय उस पर मत करो क़ाएम कोई
जानते जिस को नहीं नज़दीक से
इफ़्तिख़ार राग़िब
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'राग़िब' वो मेरी फ़िक्र में ख़ुद को भी भूल जाएँ
ऐसी तो कोई बात नहीं चाहता था मैं
इफ़्तिख़ार राग़िब
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सख़्त-जानी की बदौलत अब भी हम हैं ताज़ा-दम
ख़ुश्क हो जाते हैं वर्ना पेड़ हिल जाने के बाद
इफ़्तिख़ार राग़िब
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तक़दीर-ए-वफ़ा का फूट जाना
मैं भूला न दिल का टूट जाना
इफ़्तिख़ार राग़िब
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