मैं जिन्हें याद हूँ अब तक यही कहते होंगे
शाहज़ादा कभी नाकाम नहीं आ सकता
इदरीस बाबर
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मर गया ख़ास तौर पर मैं भी
जिस तरह आम लोग मरते हैं
इदरीस बाबर
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मौत की पहली अलामत साहिब
यही एहसास का मर जाना है
इदरीस बाबर
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मौत उकता चुकी रीहरसल में
रोज़ दो चार शख़्स मरते हैं
इदरीस बाबर
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मिरे सवाल वही टूट-फूट की ज़द में
जवाब उन के वही हैं बने-बनाए हुए
इदरीस बाबर
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पर नहीं होते ख़यालों के तो फिर
कैसे उड़ते हैं ग़ुबारा समझो
इदरीस बाबर
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फूल है जो किताब में अस्ल है कि ख़्वाब है
उस ने इस इज़्तिराब में कुछ न पढ़ा लिखा तो फिर
इदरीस बाबर
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