ख़ुशी मेरी गवारा थी न क़िस्मत को न दुनिया को
सो मैं कुछ ग़म बरा-ए-ख़ातिर-ए-अहबाब उठा लाई
हुमैरा राहत
मिरे दिल के अकेले घर में 'राहत'
उदासी जाने कब से रह रही है
हुमैरा राहत
न हम से इश्क़ का मफ़्हूम पूछो
ये लफ़्ज़ अपने मआनी से बड़ा है
हुमैरा राहत
सुना है ख़्वाब मुकम्मल कभी नहीं होते
सुना है इश्क़ ख़ता है सो कर के देखते हैं
हुमैरा राहत
तअल्लुक़ की नई इक रस्म अब ईजाद करना है
न उस को भूलना है और न उस को याद करना है
हुमैरा राहत
उसे भी ज़िंदगी करनी पड़ेगी 'मीर' जैसी
सुख़न से गर कोई रिश्ता निभाना चाहता है
हुमैरा राहत
वो और थे कि जो ना-ख़ुश थे दो जहाँ ले कर
हमारे पास तो बस इक जहान था न रहा
हुमैरा राहत

