बहुत ताख़ीर से पाया है ख़ुद को
मैं अपने सब्र का फल हो गई हूँ
हुमैरा राहत
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बना कर एक घर दिल की ज़मीं पर उस की यादों का
कभी आबाद करना है कभी बर्बाद करना है
हुमैरा राहत
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गुज़र जाएगी सारी रात इस में
मिरा क़िस्सा कहानी से बड़ा है
हुमैरा राहत
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हुज़ूर आप कोई फ़ैसला करें तो सही
हैं सर झुके हुए दरबार भी लगा हुआ है
हुमैरा राहत
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जहाँ इक शख़्स भी मिलता नहीं है चाहने से
वहाँ ये दिल हथेली पर ज़माना चाहता है
हुमैरा राहत
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जो मंज़िल तक जा के और कहीं मुड़ जाए
तुम ऐसे रस्ते के दुख से ना-वाक़िफ़ हो
हुमैरा राहत
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कभी कभी तो जुदा बे-सबब भी होते हैं
सदा ज़माने की तक़्सीर थोड़ी होती है
हुमैरा राहत
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