हम से आदाब जीने के सीखो
हम बुज़ुर्गों में बैठे बहुत हैं
हिना तैमूरी
अपने घरों के कर दिए आँगन लहू लहू
हर शख़्स मेरे शहर का क़ाबील हो गया
हीरानंद सोज़
अब तो दीवानों से यूँ बच के गुज़र जाती है
बू-ए-गुल भी तिरे दामन की हवा हो जैसे
होश तिर्मिज़ी
दश्त-ए-वफ़ा में जल के न रह जाएँ अपने दिल
वो धूप है कि रंग हैं काले पड़े हुए
होश तिर्मिज़ी
दिल को ग़म रास है यूँ गुल को सबा हो जैसे
अब तो ये दर्द की सूरत ही दवा हो जैसे
होश तिर्मिज़ी
मिलने को है खमोशी-ए-अहल-ए-जुनूँ की दाद
उठने को है ज़मीं से धुआँ देखते रहो
होश तिर्मिज़ी
तज़ईन-ए-बज़्म-ए-ग़म के लिए कोई शय तो हो
रौशन चराग़-ए-दिल न सही जाम-ए-मय तो हो
होश तिर्मिज़ी

