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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

वो इश्क़ को किस तरह समझ पाएगा जिस ने
सहरा से गले मिलते समुंदर नहीं देखा

हुमैरा राहत




वो मुझ को आज़माता ही रहा है ज़िंदगी भर
मगर ये दिल अब उस को आज़माना चाहता है

हुमैरा राहत




ये किस की याद की बारिश में भीगता है बदन
ये कैसा फूल सर-ए-शाख़-ए-जाँ खिला हुआ है

हुमैरा राहत




ज़िक्र सुनती हूँ उजाले का बहुत
उस से कहना कि मिरे घर आए

हुमैरा राहत




अजब मज़ाक़ उस का था कि सर से पाँव तक मुझे
वफ़ाओं से भिगो दिया नदामतों की सोच में

हुमैरा रहमान




गुज़शता मौसमों में बुझ गए हैं रंग फूलों के
दरीचा अब भी मेरा रौशनी के ज़ावियों पर है

हुमैरा रहमान




हम और तुम जो बदल गए तो इतनी हैरत क्या
अक्स बदलते रहते हैं आईनों की ख़ातिर

हुमैरा रहमान