टूटा तो अज़ीज़ और हुआ अहल-ए-वफ़ा को
दिल भी कहीं उस शोख़ का पैमाँ तो नहीं है
अज़ीम मुर्तज़ा
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वही यकसानियत-ए-शाम-ओ-सहर है कि जो थी
ज़िंदगी दस्त-ब-दिल ख़ाक-बसर है कि जो थी
अज़ीम मुर्तज़ा
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चाँद को तुम आवाज़ तो दे लो
एक मुसाफ़िर तन्हा तो है
अज़ीम कुरेशी
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हम भी किसी शीरीं के लिए ख़ाना-बदर थे
फ़रहाद रह-ए-इश्क़ में तन्हा तो न निकला
अज़ीम कुरेशी
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हिज्र में उस निगार-ए-ताबाँ के
लम्हा लम्हा बरस है क्या कीजे
अज़ीम कुरेशी
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हुस्न और इश्क़ हैं दोनों काफ़िर
दोनों में इक झगड़ा सा है
अज़ीम कुरेशी
जम भी वही दारा भी सिकंदर भी वही है
जी कर भी तिरा और जो मर कर भी तिरा है
अज़ीम कुरेशी
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