जो हो सके तो चले आओ आज मेरी तरफ़
मिले भी देर हुई और जी उदास भी है
अज़ीम मुर्तज़ा
ख़ुलूस-ए-नियत-ए-रहबर पे मुनहसिर है 'अज़ीम'
मक़ाम-ए-इश्क़ बहुत दूर भी है पास भी है
अज़ीम मुर्तज़ा
कुछ आप का ग़म कुछ ग़म-ए-जाँ कुछ ग़म-ए-दुनिया
दामन में मिरे फूल भी हैं ख़ार भी ख़स भी
अज़ीम मुर्तज़ा
कुछ नक़्श तिरी याद के बाक़ी हैं अभी तक
दिल बे-सर-ओ-सामाँ सही वीराँ तो नहीं है
अज़ीम मुर्तज़ा
क्या क्या फ़राग़तें थीं मयस्सर हयात को
वो दिन भी थे कि तेरे सिवा कोई ग़म न था
अज़ीम मुर्तज़ा
तन्हाई का सन्नाटा और आती जाती रातें
तेरी याद न और कोई ग़म फिर भी नींद न आए
अज़ीम मुर्तज़ा
तुझ से मिल के भी तेरा इंतिज़ार रहता है
सुब्ह रू-ए-ख़ंदाँ से शाम ज़ुल्फ़-ए-बरहम तक
अज़ीम मुर्तज़ा

