उसे भी जाते हुए तुम ने मुझ से छीन लिया
तुम्हारा ग़म तो मिरी आरज़ू का ज़ेवर था
आज़ाद गुलाटी
वक़्त का ये मोड़ कैसा है कि तुझ से मिल के भी
तुझ को खो देने का ग़म कुछ और गहरा हो गया
आज़ाद गुलाटी
वो वक़्त आएगा जब ख़ुद तुम्ही ये सोचोगी
मिला न होता अगर तुझ से मैं तो बेहतर था
आज़ाद गुलाटी
यादों की महफ़िल में खो कर
दिल अपना तन्हा तन्हा है
आज़ाद गुलाटी
ये मैं था या मिरे अंदर का ख़ौफ़ था जिस ने
तमाम उम्र दी तन्हाई की सज़ा मुझ को
आज़ाद गुलाटी
ज़िंदगी ऐ ज़िंदगी!! आ दो घड़ी मिल कर रहें
तुझ से मेरा उम्र-भर का तो कोई झगड़ा न था
आज़ाद गुलाटी
इस तरह फूँक मेरा गुलिस्तान-ए-आरज़ू
फिर कोई तेरे बाद इसे वीराँ न कर सके
आज़म चिश्ती

