हाथ पत्थर से हो गए मानूस
शौक़ कूज़ा-गरी का क्या कीजे
अज़हर अब्बास
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जो रुकावट थी हमारी राह की
रास्ता निकला उसी दीवार से
अज़हर अब्बास
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मुझे बयान कर रहा था कोई शख़्स
मैं अपनी दास्तान ढूँढता रहा
अज़हर अब्बास
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सुना रहा है कहानी हमें मकीनों की
मकाँ के साथ ये आधा जला हुआ बिस्तर
अज़हर अब्बास
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तू कहानी के बदलते हुए मंज़र को समझ
ख़ून रोते हुए किरदार की जानिब मत देख
अज़हर अब्बास
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यूँ तो हर एक शख़्स का अपना ही शोर है
लेकिन किसी से कोई यहाँ बोलता नहीं
अज़हर अब्बास
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आज निकले याद की ज़म्बील से
मोर के टूटे हुए दो चार पर
अज़हर अदीब
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