EN اردو
2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

खड़ा हूँ ज़ेर-ए-फ़लक गुम्बद-ए-सदा में 'मुनीर'
कि जैसे हाथ उठा हो कोई दुआ के लिए

मुनीर नियाज़ी




ख़याल जिस का था मुझे ख़याल में मिला मुझे
सवाल का जवाब भी सवाल में मिला मुझे

मुनीर नियाज़ी




ख़ुश्बू की दीवार के पीछे कैसे कैसे रंग जमे हैं
जब तक दिन का सूरज आए उस का खोज लगाते रहना

मुनीर नियाज़ी




ख़्वाब होते हैं देखने के लिए
उन में जा कर मगर रहा न करो

मुनीर नियाज़ी




ख़्वाहिशें हैं घर से बाहर दूर जाने की बहुत
शौक़ लेकिन दिल में वापस लौट कर आने का था

मुनीर नियाज़ी




किसी अकेली शाम की चुप में
गीत पुराने गा के देखो

मुनीर नियाज़ी




किसी को अपने अमल का हिसाब क्या देते
सवाल सारे ग़लत थे जवाब क्या देते

मुनीर नियाज़ी