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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

हस्ती ही अपनी क्या है ज़माने के सामने
इक ख़्वाब हैं जहाँ में बिखर जाएँ हम तो क्या

मुनीर नियाज़ी




हूँ मकाँ में बंद जैसे इम्तिहाँ में आदमी
सख़्ती-ए-दीवार-ओ-दर है झेलता जाता हूँ मैं

मुनीर नियाज़ी




इक और दरिया का सामना था 'मुनीर' मुझ को
मैं एक दरिया के पार उतरा तो मैं ने देखा

मुनीर नियाज़ी




इक तेज़ रा'द जैसी सदा हर मकान में
लोगों को उन के घर में डरा देना चाहिए

मुनीर नियाज़ी




इम्तिहाँ हम ने दिए इस दार-ए-फ़ानी में बहुत
रंज खींचे हम ने अपनी ला-मकानी में बहुत

मुनीर नियाज़ी




जंगलों में कोई पीछे से बुलाए तो 'मुनीर'
मुड़ के रस्ते में कभी उस की तरफ़ मत देखो

मुनीर नियाज़ी




जानता हूँ एक ऐसे शख़्स को मैं भी 'मुनीर'
ग़म से पत्थर हो गया लेकिन कभी रोया नहीं

मुनीर नियाज़ी