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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

जानते थे दोनों हम उस को निभा सकते नहीं
उस ने व'अदा कर लिया मैं ने भी व'अदा कर लिया

मुनीर नियाज़ी




जब सफ़र से लौट कर आए तो कितना दुख हुआ
इस पुराने बाम पर वो सूरत-ए-ज़ेबा न थी

मुनीर नियाज़ी




जी ख़ुश हुआ है गिरते मकानों को देख कर
ये शहर ख़ौफ़-ए-ख़ुद से जिगर-चाक तो हुआ

मुनीर नियाज़ी




जिन के होने से हम भी हैं ऐ दिल
शहर में हैं वो सूरतें बाक़ी

मुनीर नियाज़ी




जुर्म आदम ने किया और नस्ल-ए-आदम को सज़ा
काटता हूँ ज़िंदगी भर मैं ने जो बोया नहीं

मुनीर नियाज़ी




कल मैं ने उस को देखा तो देखा नहीं गया
मुझ से बिछड़ के वो भी बहुत ग़म से चूर था

मुनीर नियाज़ी




कटी है जिस के ख़यालों में उम्र अपनी 'मुनीर'
मज़ा तो जब है कि उस शोख़ को पता ही न हो

मुनीर नियाज़ी