लकीरें खींचते रहने से बन गई तस्वीर
कोई भी काम हो, बे-कार थोड़ी होता है
ख़ालिद मोईन
मैं ने तुझ को मंज़िल जाना
तू मुझ को रस्ता समझा था
ख़ालिद मोईन
मौसम-ए-याद का कोई झोंका, अब जो गुज़रे तुम्हारी ख़ल्वत से
सोच लेना हमारे बारे में, पर हमारा मलाल मत करना
ख़ालिद मोईन
मोहब्बत की तो कोई हद, कोई सरहद नहीं होती
हमारे दरमियाँ ये फ़ासले, कैसे निकल आए
ख़ालिद मोईन
मुन्कशिफ़! आज तलक हो न सका
मैं ख़ला हूँ कि ख़ला है मुझ में
ख़ालिद मोईन
सदाएँ डूब जाती हैं हवा के शोर में और मैं
गली-कूचों में तन्हा चीख़ता रहता हूँ बारिश में
ख़ालिद मोईन
शाम पड़े सो जाने वाला! दीप बुझा कर यादों के
रात गए तक जाग रहा था पहली पहली बारिश में
ख़ालिद मोईन

