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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

गुज़र रही है जो दिल पर वही हक़ीक़त है
ग़म-ए-जहाँ का फ़साना ग़म-ए-हयात से पूछ

ख़ालिद मलिक साहिल




हम लोग तो अख़्लाक़ भी रख आए हैं 'साहिल'
रद्दी के इसी ढेर में आदाब पड़े थे

ख़ालिद मलिक साहिल




इस शहर के लोगों पे भरोसा नहीं करना
ज़ंजीर कोई दर पे लगाओ कि चला मैं

ख़ालिद मलिक साहिल




इस तिश्ना-लबी पर मुझे एज़ाज़ तो बख़्शो
ऐ बादा-कशो जाम उठाओ कि चला मैं

ख़ालिद मलिक साहिल




जवाब जिस का नहीं कोई वो सवाल बना
मैं ख़्वाब में उसे देखूँ कोई ख़याल बना

ख़ालिद मलिक साहिल




जुनूँ का कोई फ़साना तो हाथ आने दो
मैं रो पड़ूँगा बहाना तो हाथ आने दो

ख़ालिद मलिक साहिल




ख़्वाब देखा था मोहब्बत का मोहब्बत की क़सम
फिर इसी ख़्वाब की ताबीर में मसरूफ़ था मैं

ख़ालिद मलिक साहिल