किसी ख़याल का कोई वजूद हो शायद
बदल रहा हूँ मैं ख़्वाबों को तजरबा कर के
ख़ालिद मलिक साहिल
लफ़्ज़ रंगों में नहाए हुए घर में आए
तेरी आवाज़ की तस्वीर में मसरूफ़ था मैं
ख़ालिद मलिक साहिल
मैं अपनी आँख भी ख़्वाबों से धो नहीं पाया
मैं कैसे दूँगा ज़माने को जो नहीं पाया
ख़ालिद मलिक साहिल
मैं किस यक़ीन से लिक्खा गया हूँ मिट्टी पर
वो कौन है जो मिरे सिलसिले की ढाल बना
ख़ालिद मलिक साहिल
मैं तमाशा हूँ तमाशाई हैं चारों जानिब
शर्म है शर्म के मारे नहीं रो सकता मैं
ख़ालिद मलिक साहिल
रौशनी की अगर अलामत है
राख उड़ती है क्यूँ शरारे पर
ख़ालिद मलिक साहिल
तुम मस्लहत कहो या मुनाफ़िक़ कहो मुझे
दिल में मगर ग़ुबार बहुत देर तक रहा
ख़ालिद मलिक साहिल

