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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

आज कुछ रंग दिगर है मिरे घर का 'ख़ालिद'
सोचता हूँ ये तिरी याद है या ख़ुद तू है

ख़ालिद शरीफ़




आज से इक दूसरे को क़त्ल करना है हमें
तू मिरा पैकर नहीं है मैं तिरा साया नहीं

ख़ालिद शरीफ़




आसमाँ झाँक रहा है 'ख़ालिद'
चाँद कमरे में मिरे उतरा है

ख़ालिद शरीफ़




बिछड़ा कुछ इस अदा से कि रुत ही बदल गई
इक शख़्स सारे शहर को वीरान कर गया

ख़ालिद शरीफ़




'ख़ालिद' मैं बात बात पे कहता था जिस को जान
वो शख़्स आख़िरश मुझे बे-जान कर गया

ख़ालिद शरीफ़




नाकाम हसरतों के सिवा कुछ नहीं रहा
दुनिया में अब दुखों के सिवा कुछ नहीं रहा

ख़ालिद शरीफ़




वो तो गया अब अपनी अना को समेट ले
ऐ ग़म-गुसार दस्त-ए-दुआ को समेट ले

ख़ालिद शरीफ़