हम को जाना था किस तरफ़ 'रज़्मी'!
और किस सम्त हैं रवाँ हम लोग
ख़ादिम रज़्मी
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कुछ इस लिए भी वो सैलाब भेज देता है
कि बस्तियों में रहो और खंडर भी साथ रखो
ख़ादिम रज़्मी
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उम्रें गुज़र गई हैं असर की तलाश में
किस ना-मुराद लब की दुआ हो गए हैं हम
ख़ादिम रज़्मी
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ऐसा हो ज़िंदगी में कोई ख़्वाब ही न हो
अँधियारी रात में कोई महताब ही न हो
ख़लील मामून
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ऐसे मर जाएँ कोई नक़्श न छोड़ें अपना
याद दिल में न हो अख़बार में तस्वीर न हो
ख़लील मामून
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चलना लिखा है अपने मुक़द्दर में उम्र भर
मंज़िल हमारी दर्द की राहों में गुम हुई
ख़लील मामून
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दर्द के सहारे कब तलक चलेंगे
साँस रुक रही है फ़ासला बड़ा है
ख़लील मामून
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