मुझे तो इश्क़ है फूलों में सिर्फ़ ख़ुशबू से
बुला रही है किसी लाला की महक मुझ को
ख़लील मामून
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रफ़्तार-ए-रोज़-ओ-शब से कहाँ तक निभाऊँगा
थक-हार कर मैं घर की तरफ़ लौट जाऊँगा
ख़लील मामून
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सब लोग हमें एक नज़र आते हैं
अंदाज़ा नहीं होता है अब चेहरों का
ख़लील मामून
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सर्फ़ चेहरा ही नज़र आता है आईने में
अक्स-ए-आईना नहीं दिखता है आईने में
ख़लील मामून
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शायद अपना पता भी मिल जाए
झाँकता हूँ तिरी निगाहों में
ख़लील मामून
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तेरी क्या ये हालत हो गई है 'मामून'
ख़ुद ही कह रहा है ख़ुद ही सुन रहा है
ख़लील मामून
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तुम हो खोए हुए ज़माने में
मैं ख़ुद अपनी ही ज़ात में गुम हूँ
ख़लील मामून
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