थक थक के तिरी राह में यूँ बैठ गया हूँ
गोया कि बस अब मुझ से सफ़र हो नहीं सकता
कशफ़ी मुल्तानी
ज़माना आया कुछ ऐसा कि अब तो हर घर में
लटक रही है मसर्रत नज़ीर की तस्वीर
कशफ़ी मुल्तानी
धूप साए की तरह फैल गई
इन दरख़्तों की दुआ लेने से
काशिफ़ हुसैन ग़ाएर
हमारे दिल की तरह शहर के ये रस्ते भी
हज़ार भेद छुपाए हुए से लगते हैं
काशिफ़ हुसैन ग़ाएर
हमारी ज़िंदगी पर मौत भी हैरान है 'ग़ाएर'
न जाने किस ने ये तारीख़-ए-पैदाइश निकाली है
काशिफ़ हुसैन ग़ाएर
इक दिन दुख की शिद्दत कम पड़ जाती है
कैसी भी हो वहशत कम पड़ जाती है
काशिफ़ हुसैन ग़ाएर
इन सितारों में कहीं तुम भी हो
इन नज़ारों में कहीं मैं भी हूँ
काशिफ़ हुसैन ग़ाएर

