कल रात जगाती रही इक ख़्वाब की दूरी
और नींद बिछाती रही बिस्तर मिरे आगे
काशिफ़ हुसैन ग़ाएर
कुछ ऐसी भी दिल की बातें होती हैं
जिन बातों को ख़ल्वत कम पड़ जाती है
काशिफ़ हुसैन ग़ाएर
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कुछ देर बैठ जाइए दीवार के क़रीब
क्या कह रहा है साया-ए-दीवार जानिए
काशिफ़ हुसैन ग़ाएर
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क्या चाहती है हम से हमारी ये ज़िंदगी
क्या क़र्ज़ है जो हम से अदा हो नहीं रहा
काशिफ़ हुसैन ग़ाएर
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क्या कहें और दिल के बारे में
हम मुलाज़िम हैं इस इदारे में
काशिफ़ हुसैन ग़ाएर
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मौत का क्या काम जब इस शहर में
ज़िंदगी जैसी बला मौजूद है
काशिफ़ हुसैन ग़ाएर
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मेरे अंदर का शोर है मुझ में
वर्ना बाहर तो ख़ामुशी है यहाँ
काशिफ़ हुसैन ग़ाएर
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