मसर्रत ज़िंदगी का दूसरा नाम
मसर्रत की तमन्ना मुस्तक़िल ग़म
जिगर मुरादाबादी
मौत क्या एक लफ़्ज़-ए-बे-मअ'नी
जिस को मारा हयात ने मारा
जिगर मुरादाबादी
मेरे दर्द में ये ख़लिश कहाँ मेरे सोज़ में ये तपिश कहाँ
किसी और ही की पुकार है मिरी ज़िंदगी की सदा नहीं
जिगर मुरादाबादी
मेरी बर्बादियाँ दुरुस्त मगर
तू बता क्या तुझे सवाब हुआ
जिगर मुरादाबादी
मेरी निगाह-ए-शौक़ भी कुछ कम नहीं मगर
फिर भी तिरा शबाब तिरा ही शबाब है
जिगर मुरादाबादी
मिरी हस्ती है मिरी तर्ज़-ए-तमन्ना ऐ दोस्त
ख़ुद मैं फ़रियाद हूँ मेरी कोई फ़रियाद नहीं
जिगर मुरादाबादी
मिरी रूदाद-ए-ग़म वो सुन रहे हैं
तबस्सुम सा लबों पर आ रहा है
जिगर मुरादाबादी

