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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

लाखों में इंतिख़ाब के क़ाबिल बना दिया
जिस दिल को तुम ने देख लिया दिल बना दिया

जिगर मुरादाबादी




लबों पे मौज-ए-तबस्सुम निगह में बर्क़-ए-ग़ज़ब
कोई बताए ये अंदाज़-ए-बरहमी क्या है

जिगर मुरादाबादी




ले के ख़त उन का किया ज़ब्त बहुत कुछ लेकिन
थरथराते हुए हाथों ने भरम खोल दिया

जिगर मुरादाबादी




मैं जहाँ हूँ तिरे ख़याल में हूँ
तू जहाँ है मिरी निगाह में है

जिगर मुरादाबादी




मैं तो जब मानूँ मिरी तौबा के बाद
कर के मजबूर पिला दे साक़ी

जिगर मुरादाबादी




मय-कशो मुज़्दा कि बाक़ी न रही क़ैद-ए-मकाँ
आज इक मौज बहा ले गई मयख़ाने को

जिगर मुरादाबादी




मर्ग-ए-आशिक़ तो कुछ नहीं लेकिन
इक मसीहा-नफ़स की बात गई

जिगर मुरादाबादी