लाखों में इंतिख़ाब के क़ाबिल बना दिया
जिस दिल को तुम ने देख लिया दिल बना दिया
जिगर मुरादाबादी
लबों पे मौज-ए-तबस्सुम निगह में बर्क़-ए-ग़ज़ब
कोई बताए ये अंदाज़-ए-बरहमी क्या है
जिगर मुरादाबादी
ले के ख़त उन का किया ज़ब्त बहुत कुछ लेकिन
थरथराते हुए हाथों ने भरम खोल दिया
जिगर मुरादाबादी
मैं जहाँ हूँ तिरे ख़याल में हूँ
तू जहाँ है मिरी निगाह में है
जिगर मुरादाबादी
मैं तो जब मानूँ मिरी तौबा के बाद
कर के मजबूर पिला दे साक़ी
जिगर मुरादाबादी
मय-कशो मुज़्दा कि बाक़ी न रही क़ैद-ए-मकाँ
आज इक मौज बहा ले गई मयख़ाने को
जिगर मुरादाबादी
मर्ग-ए-आशिक़ तो कुछ नहीं लेकिन
इक मसीहा-नफ़स की बात गई
जिगर मुरादाबादी

