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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

कमाल-ए-तिश्नगी ही से बुझा लेते हैं प्यास अपनी
इसी तपते हुए सहरा को हम दरिया समझते हैं

जिगर मुरादाबादी




कोई ये कह दे गुलशन गुलशन
लाख बलाएँ एक नशेमन

जिगर मुरादाबादी




कुछ खटकता तो है पहलू में मिरे रह रह कर
अब ख़ुदा जाने तिरी याद है या दिल मेरा

जिगर मुरादाबादी




कूचा-ए-इश्क़ में निकल आया
जिस को ख़ाना-ख़राब होना था

जिगर मुरादाबादी




क्या बताऊँ किस क़दर ज़ंजीर-ए-पा साबित हुए
चंद तिनके जिन को अपना आशियाँ समझा था में

जिगर मुरादाबादी




क्या हुस्न ने समझा है क्या इश्क़ ने जाना है
हम ख़ाक-नशीनों की ठोकर में ज़माना है

जिगर मुरादाबादी




क्या ख़बर थी ख़लिश-ए-नाज़ न जीने देगी
ये तिरी प्यार की आवाज़ न जीने देगी

जिगर मुरादाबादी