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2 लाइन शायरी शायरी | शाही शायरी

2 लाइन शायरी

22761 शेर

मिरी ज़िंदगी तो गुज़री तिरे हिज्र के सहारे
मिरी मौत को भी प्यारे कोई चाहिए बहाना

जिगर मुरादाबादी




मोहब्बत में हम तो जिए हैं जिएँगे
वो होंगे कोई और मर जाने वाले

जिगर मुरादाबादी




मोहब्बत में इक ऐसा वक़्त भी दिल पर गुज़रता है
कि आँसू ख़ुश्क हो जाते हैं तुग़्यानी नहीं जाती

जिगर मुरादाबादी




मोहब्बत में ये क्या मक़ाम आ रहे हैं
कि मंज़िल पे हैं और चले जा रहे हैं

जिगर मुरादाबादी




मोहब्बत सुल्ह भी पैकार भी है
ये शाख़-ए-गुल भी है तलवार भी है

जिगर मुरादाबादी




मुझे दे रहे हैं तसल्लियाँ वो हर एक ताज़ा पयाम से
कभी आ के मंज़र-ए-आम पर कभी हट के मंज़र-ए-आम से

जिगर मुरादाबादी




मुझी में रहे मुझ से मस्तूर हो कर
बहुत पास निकले बहुत दूर हो कर

जिगर मुरादाबादी