ख़्वाबों की तरह आना ख़ुशबू की तरह जाना
मुमकिन ही नहीं लगता ऐ दोस्त तुझे पाना
अतहर शकील
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आईना आईना तैरता कोई अक्स
और हर ख़्वाब में दूसरा ख़्वाब है
अतीक़ुल्लाह
अभी तो काँटों-भरी झाड़ियों में अटका है
कभी दिखाई दिया था हरा-भरा वो भी
अतीक़ुल्लाह
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अपने सूखे हुए गुल-दान का ग़म है मुझ को
आँख में अश्क का क़तरा भी नहीं है कोई
अतीक़ुल्लाह
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बड़ी चीज़ है ये सुपुर्दगी का महीन पल
न समझ सको तो मुझे गँवा के भी देखना
अतीक़ुल्लाह
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दिन के हंगामे जिला देते हैं मुझ को वर्ना
सुब्ह से पहले कई मर्तबा मर जाता हूँ
अतीक़ुल्लाह
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फ़ज़ा में हाथ तो उट्ठे थे एक साथ कई
किसी के वास्ते कोई दुआ न करता था
अतीक़ुल्लाह
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