जी न सकूँ मैं जिस के बग़ैर
अक्सर याद न आया वो
अतहर नफ़ीस
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कभी साया है कभी धूप मुक़द्दर मेरा
होता रहता है यूँ ही क़र्ज़ बराबर मेरा
अतहर नफ़ीस
ख़्वाबों के उफ़ुक़ पर तिरा चेहरा हो हमेशा
और मैं उसी चेहरे से नए ख़्वाब सजाऊँ
अतहर नफ़ीस
किसी ना-ख़्वांदा बूढ़े की तरह ख़त उस का पढ़ता हूँ
कि सौ सौ बार इक इक लफ़्ज़ से उँगली गुज़रती है
अतहर नफ़ीस
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लम्हों के अज़ाब सह रहा हूँ
मैं अपने वजूद की सज़ा हूँ
अतहर नफ़ीस
मैं तेरे क़रीब आते आते
कुछ और भी दूर हो गया हूँ
अतहर नफ़ीस
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उस ने मिरी निगाह के सारे सुख़न समझ लिए
फिर भी मिरी निगाह में एक सवाल है नया
अतहर नफ़ीस
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