हम ज़मीं की तरफ़ जब आए थे
आसमानों में रह गया था कुछ
अतीक़ुल्लाह
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हर मंज़र के अंदर भी इक मंज़र है
देखने वाला भी तो हो तय्यार मुझे
अतीक़ुल्लाह
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इस गली से उस गली तक दौड़ता रहता हूँ मैं
रात उतनी ही मयस्सर है सफ़र उतना ही है
अतीक़ुल्लाह
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कहाँ पहुँच के हदें सब तमाम होती हैं
इस आसमान से नीचे उतर के देखा जाए
अतीक़ुल्लाह
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ख़्वाबों की किर्चियाँ मिरी मुट्ठी में भर न जाए
आइंदा लम्हा अब के भी यूँही गुज़र न जाए
अतीक़ुल्लाह
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किस के पैरों के नक़्श हैं मुझ में
मेरे अंदर ये कौन चलता है
अतीक़ुल्लाह
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किसी इक ज़ख़्म के लब खुल गए थे
मैं इतनी ज़ोर से चीख़ा नहीं था
अतीक़ुल्लाह
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