तुझ से बिछड़ के हम तो यही सोचते रहे
ये गर्दिश-ए-हयात न आएगी रास क्या
अतहर नादिर
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तू हर इक का है और किसी का नहीं
लोग कहते रहें हमारा चाँद
अतहर नादिर
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वो इश्क़ जिस की ज़माने को भी ख़बर न रही
तिरे बिछड़ने से रुस्वा नगर नगर में रहा
अतहर नादिर
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ये अपना अपना मुक़द्दर है इस को क्या कहिए
तुझे सराब तो दरिया बना दिया है मुझे
अतहर नादिर
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ये इंक़िलाब-ए-ज़माना नहीं तो फिर क्या है
अमीर-ए-शहर जो कल था वो है फ़क़ीरों में
अतहर नादिर
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ऐ मुझ को फ़रेब देने वाले
मैं तुझ पे यक़ीन कर चुका हूँ
अतहर नफ़ीस
'अतहर' तुम ने इश्क़ किया कुछ तुम भी कहो क्या हाल हुआ
कोई नया एहसास मिला या सब जैसा अहवाल हुआ
अतहर नफ़ीस

