किस दर्जा मिरे शहर की दिलकश है फ़ज़ा भी
मानूस हर इक चीज़ है मिट्टी भी हवा भी
अतहर नादिर
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कोई मिले न मिले बे-क़रार रहता है
कि दिल का हाल भी इक मौज-ए-आब जैसा है
अतहर नादिर
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कोई नहीं है ऐसा कि अपना कहें जिसे
कैसा तिलिस्म टूटा है अपने गुमान का
अतहर नादिर
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लोग क्या सादा हैं उम्मीद-ए-वफ़ा रखते हैं
जैसे मा'लूम नहीं उन को हक़ीक़त तेरी
अतहर नादिर
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लोग क़िस्मत पे छोड़ देते हैं
बात बनती नहीं है जब कुछ भी
अतहर नादिर
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रात आँगन में चाँद उतरा था
तुम मिले थे कि ख़्वाब देखा था
अतहर नादिर
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सुकून-ए-क़ल्ब तो किया है क़रार-ए-जाँ भी लुटा
तुम्हारी याद भी आई तो राहज़न की तरह
अतहर नादिर
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