क़रीब से न गुज़र इंतिज़ार बाक़ी रख
क़राबतों का मगर ए'तिबार बाक़ी रख
अतीक़ असर
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उठे जाते हैं दीदा-वर सभी आहिस्ता आहिस्ता
ये दुनिया मो'तबर लोगों से ख़ाली होती जाती है
अतीक़ असर
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वो बात मुझ को तो दुश्नाम सी लगी है 'अतीक़'
तुम्हारा नाम लिखा किस ने बे-वफ़ाओं में
अतीक़ असर
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आईना दूसरों की जानिब है
अपनी सूरत नज़र नहीं आती
अतीया नियाज़ी
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आदमी का अमल से रिश्ता है
काम आता नहीं नसब कुछ भी
अतहर नादिर
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अब आ भी जाओ कि इक दूसरे में गुम हो जाएँ
विसाल-ओ-हिज्र का क़िस्सा बहुत पुराना हुआ
अतहर नादिर
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देखो तो हर इक रंग से मिलता है मिरा रंग
सोचो तो हर इक बात है औरों से जुदा भी
अतहर नादिर
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